#bnnindianews देश के मूल संविधान में प्रकाशित 22 उत्कृष्ट कृतियों को उपलब्ध प्रतियों से हटाना दुर्भाग्यपूर्ण : संविधान विशेषज्ञ बलराम गुप्ता
यदि मैंने अपने वकालत के सफर के दौरान इन कृतियों को देखा होता तो उनके द्वारा लड़े गए कई केसों का निपटारा कुछ अलग ढंग से हुआ होता : बलराम गुप्ता
इस वर्ष संसद में भी ये मुद्दा उठने पर सरकार ने मानी थी गलती, परन्तु अभी तक कोई आवश्यक कार्यवाई नहीं हुई
प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक नादिर की नई किताब “द इंडियन कांस्टीट्यूश –अ कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ लॉ, आर्ट एंड हिस्ट्री” इसी विषय पर है : 21 दिसम्बर को होगा विमोचन
चण्डीगढ़ :
यह लेख साहित्यकार अशोक नादिर और संविधान विशेषज्ञ बलराम गुप्ता द्वारा चण्डीगढ़ प्रेस क्लब में दी गई जानकारी का सारांश है। इसका मुख्य बिंदु यह है कि भारत का मूल संविधान केवल एक कानूनी ग्रंथ नहीं, बल्कि एक कलात्मक और सांस्कृतिक धरोहर भी है।
मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
-
गायब कलाकृतियाँ: मूल संविधान के 22 अध्यायों में नंदलाल बोस और उनके शिष्यों द्वारा बनाए गए 22 सुंदर चित्र हैं। अफ़सोस की बात है कि आम जनता के पास उपलब्ध प्रतियों में ये चित्र नहीं होते।

-
नई पुस्तक: अशोक नादिर की पुस्तक “द इंडियन कांस्टीट्यूशन – अ कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ लॉ, आर्ट एंड हिस्ट्री” का विमोचन 21 दिसम्बर को होगा, जो इन्हीं चित्रों के महत्व पर आधारित है।
-
चित्रों का संदेश: ये चित्र भारत के 5,000 साल के इतिहास को दर्शाते हैं। इनमें मोहनजोदड़ो, वैदिक आश्रम, बुद्ध, महावीर, रामायण, महाभारत, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह, लक्ष्मीबाई और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व शामिल हैं।
-
सभ्यता का दर्पण: ये चित्र बताते हैं कि भारतीय संविधान उधार लिया हुआ दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति और आधुनिक मूल्यों (स्वतंत्रता, समानता, न्याय) का संगम है।
-
प्रमुख मांग: लेखकों ने मांग की है कि अब से संविधान की जो भी प्रतियाँ छपें, वे इन चित्रों के साथ हों ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी असली विरासत को पहचान सकें।
निष्कर्ष: संविधान की आत्मा उसके शब्दों के साथ-साथ इन चित्रों में भी बसती है। इनके बिना भारत की यह ‘पवित्र गाथा’ अधूरी है।