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चंडीगढ़, 22 फरवरी 2026: मेडिकोस लीगल एक्शन ग्रुप (MLAG) का 12वां वार्षिक सम्मेलन रविवार को सेक्टर-35 स्थित आईएमए कॉम्प्लेक्स, चंडीगढ़ में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। देशभर से आए लगभग 300 वरिष्ठ चिकित्सकों, कानूनी विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और युवा डॉक्टरों ने चिकित्सा प्रैक्टिस में बढ़ती मेडिको-लीगल चुनौतियों पर विस्तृत मंथन किया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में जस्टिस राजेश बिंदल , न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया उपस्थित रहे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “यदि हमें समाज को बचाना है तो हमें अपने डॉक्टरों को बचाना होगा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वस्थ समाज के लिए भयमुक्त चिकित्सा प्रैक्टिस अत्यंत आवश्यक है और डिफेंसिव मेडिसिन की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई।

मेडिको-लीगल विवादों में वृद्धि का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति बिंदल ने कहा कि किसी भी विवाद या मुकदमे की स्थिति में सही और सटीक डॉक्यूमेंटेशन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने चिकित्सकों से अपील की कि वे रिकॉर्ड-कीपिंग में सावधानी बरतें, पारदर्शी संवाद अपनाएं और स्थापित प्रोटोकॉल का पालन करें, ताकि अनावश्यक कानूनी उलझनों से बचा जा सके। साथ ही उन्होंने इस दिशा में कुछ ठोस संस्थागत और प्रणालीगत कदम उठाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, जिससे डॉक्टरों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित हो सके।
स्वागत भाषण देते हुए एमएलएजी के मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ. नीरज नागपाल ने बताया कि इस वर्ष के सम्मेलन का केंद्रीय विषय—“Achieving Litigation-Free Practice”—डॉक्टरों के लिए कानूनी रूप से सुरक्षित और नैतिक रूप से सुदृढ़ वातावरण बनाने की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है।
उद्घाटन समारोह का एक प्रमुख आकर्षण MLAG डॉ. टी. सेतु लक्ष्मी अवॉर्ड 2026 का श्री महेंद्र बाजपेयी, संस्थापक, इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन एंड लॉ, को प्रदान किया जाना रहा। उन्हें चिकित्सा समुदाय में मेडिको-लीगल जागरूकता और सहयोग तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
गेस्ट ऑफ ऑनर श्रुति बेदी ने कहा कि “डॉक्टर संवैधानिक एक्टर्स की तरह होते हैं।” उन्होंने कहा कि जैसे संवैधानिक संस्थाएं कानूनी दायरे में रहकर कार्य करती हैं, वैसे ही डॉक्टरों को भी नैतिक और कानूनी सीमाओं के भीतर रहकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए।
आयोजन चेयरपर्सन डॉ. अश्विनी सेठिया ने बताया कि इस सम्मेलन में अकादमिक सत्रों के साथ-साथ समकालीन और कभी-कभी विवादास्पद स्वास्थ्य मुद्दों पर संरचित बहसें भी आयोजित की गईं। इनमें लाइव सर्जिकल डिमॉन्स्ट्रेशन की वैधता व नैतिकता, अपर्याप्त प्रशिक्षण के लिए संस्थागत जिम्मेदारी, वैकल्पिक प्रक्रियाओं में जटिलताओं की वित्तीय जवाबदेही, एमबीबीएस डॉक्टरों के पेशेवर अधिकार और देश में एमबीबीएस सीटों के विस्तार की आवश्यकता जैसे विषय शामिल रहे।
आयोजन सचिव डॉ. निमिषा नागपाल ने बताया कि इस वर्ष रेजिडेंट डॉक्टरों और इंटर्न्स पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने कहा कि युवा चिकित्सकों के लिए प्रारंभिक स्तर पर कानूनी जागरूकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष कार्यशालाओं में जूनियर डॉक्टरों को सूचित सहमति (Informed Consent), प्रतिकूल या बुरी खबर देने की कला और उचित मेडिकल रिकॉर्ड-कीपिंग जैसे आवश्यक मेडिको-लीगल कौशलों का प्रशिक्षण दिया गया।
दोपहर बाद के सत्रों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों और विकसित हो रही मेडिको-लीगल न्यायशास्त्र पर चर्चा हुई। एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्च सहभागिता वाली बहसों में रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में आने वाली नैतिक और कानूनी दुविधाओं पर विचार-विमर्श किया गया।
सम्मेलन का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि निरंतर कानूनी शिक्षा, जिम्मेदार चिकित्सीय आचरण और संस्थागत सुधारों के माध्यम से नैतिक, पारदर्शी और मुकदमेबाजी-प्रतिरोधी चिकित्सा प्रैक्टिस को बढ़ावा दिया जाएगा।