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*“पंजाब सरकार को फीस की सीमा तय करने के अपने आदेश को लेकर प्राइवेट स्कूल एसोसिएशनस के साथ बातचीत करनी चाहिए,” एनआईएसए प्रमुख कुलभूषण शर्मा ने जोर देकर कहा*
*– पंजाब की प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला; कहा कि फीस की सीमा और पिछले समय की फीस वापस करने का आदेश राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा*
*- समस्या का समाधान नहीं होने पर निजी स्कूल हाईकोर्ट की शरण लेंगे।*
चंडीगढ़, 21 जुलाई, 2026: नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (एनआईएसए) के अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा और रिकॉग्नाइज्ड एफिलिएटेड स्कूल्स एसोसिएशन (आरएएसए), पंजाब के चेयरमैन हरपाल सिंह (यूके) ने पंजाब सरकार के उस अध्यादेश पर गंभीर चिंता जताई, जिसमें प्राइवेट स्कूलों की सालाना फीस बढ़ोतरी को 5% तक सीमित करने और पिछले तीन वर्षों में तय सीमा से अधिक ली गई फीस को वापस करने का निर्देश दिया गया है। आज यहां एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर इस फैसले को मौजूदा रूप में लागू किया जाता है, तो इससे प्राइवेट स्कूलों की आर्थिक स्थिरता प्रभावित होगी और उसके नतीजे में पंजाब में स्कूली शिक्षा की पूरी व्यवस्था पर काफी अधिक बुरा असर पड़ सकता है। निजी स्कूल एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि पंजाब सरकार द्वारा इस मुद्दे का समाधान नहीं किया जाता है, तो उनके पास उचित कानूनी हस्तक्षेप के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचेगा।
इस मौके पर बोलते हुए, नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (एनआईएसए) के अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने पंजाब सरकार से आग्रह किया कि वह इस मामले के सर्वमान्य समाधान के लिए प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन, अभिभावकों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और वित्तीय विशेषज्ञों के साथ व्यापक बातचीत शुरू करे। इसका मकसद एक ऐसी संतुलित, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से तैयार की गई फीस रेगुलेशन पॉलिसी बनाना होना चाहिए जो सभी पक्षों के हितों की रक्षा करे और साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता को भी बनाए रखे। वर्तमान आदेश पूरी तरह से प्राइवेट स्कूलों के हितों के खिलाफ है। शर्मा ने कहा कि एक संतुलित शिक्षा नीति समय की मांग है और सिर्फ फीस पर नियंत्रण करके ही अच्छी शिक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “हालांकि अभिभावकों के हितों की रक्षा करना महत्वपूर्ण है, लेकिन स्कूलों की आर्थिक स्थिरता, शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन और स्कूल स्टूडेंट्स को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।”
रिकॉग्नाइज्ड एफिलिएटेड स्कूल्स एसोसिएशन (आरएएसए), पंजाब के चेयरमैन हरपाल सिंह (यूके) ने कहा कि 5% फीस की सीमा और पिछले समय की फीस वापस करने का प्रावधान प्राइवेट स्कूलों के कामकाज पर बहुत बुरा असर डालेगा। इन स्कूलों ने मौजूदा कानूनी ढांचे के आधार पर वित्तीय प्रतिबद्धताएं की थीं, जिसमें सालाना 8% तक फीस बढ़ाने की अनुमति थी। सिंह ने कहा कि स्कूलों ने शिक्षकों के वेतन, स्टाफ की भर्ती, बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रयोगशालाओं, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल लर्निंग, सुरक्षा प्रणालियों और खेल सुविधाओं में काफी निवेश किया है। उन्होंने कहा कि पिछले समय का कोई भी वित्तीय बोझ स्कूलों की शैक्षिक मानकों को बनाए रखने की क्षमता को कमजोर कर देगा।
गौरतलब है कि पहले लागू नीति के तहत, प्राइवेट स्कूलों को कानूनी रूप से सालाना 8% तक फीस बढ़ाने की अनुमति थी। पंजाब सरकार के नए आदेश के बाद ये सिमट कर 5% ही रह गई है, जिसको लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।
शर्मा और हरपाल दोनों ने यह भी कहा कि स्कूल अभी भी कोविड महामारी के वित्तीय असर से उबर रहे हैं। उस दौरान कामकाज जारी रखने के लिए कई संस्थानों ने लोन लिए थे और उन्हें अभी भी लोन चुकाने की ज़िम्मेदारी निभानी पड़ रही है।
उन्होंने चेतावनी दी कि स्कूलों को पिछली तारीख से फीस वापस करने के लिए मजबूर करना कम फीस वाले और बजट प्राइवेट स्कूलों के लिए बहुत नुकसानदायक हो सकता है। ऐसे संस्थान, जो पहले से ही बहुत कम लाभ पर चल रहे हैं, उन्हें भारी आर्थिक संकट और बंद होने का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ेगा।
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में प्राइवेट स्कूलों में अभी लगभग 30.63 लाख स्टूडेंट पढ़ रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में लगभग 26.69 लाख छात्र हैं। प्राइवेट स्कूलों में लगभग 1.46 लाख शिक्षक भी काम करते हैं, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था में उनके अहम योगदान को दिखाता है। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि अगर प्राइवेट स्कूल सेक्टर कमज़ोर होता है, तो क्या सरकार के पास 30 लाख से ज़्यादा अतिरिक्त छात्रों को संभालने और लगभग 1.50 लाख शिक्षकों की भर्ती करने की आर्थिक और प्रशासनिक क्षमता है?
उन्होंने यह भी बताया कि पंजाब की सरकारी स्कूल व्यवस्था को अभी भी कई तरह की बड़ी ढांचागत चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यूडीआईएसई+ के अनुसार, राज्य में 2,431 ऐसे स्कूल हैं जिनमें सिर्फ़ एक शिक्षक है और वे लगभग 77,000 छात्रों को पढ़ाते हैं, जबकि 3,032 स्कूलों में अभी भी इंटरनेट की सुविधा नहीं है और हज़ारों शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में प्राइवेट स्कूलों को कमज़ोर करने से सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर और ज़्यादा दबाव पड़ेगा।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि पिछले तीन सालों में महंगाई और कामकाज की लागत—जिसमें बिजली, ईपीएफ योगदान, ट्रांसपोर्ट, रखरखाव, टेक्नोलॉजी, सुरक्षा उपाय और अन्य ज़रूरी खर्च शामिल हैं—काफी अधिक बढ़ गई है। चूंकि प्राइवेट स्कूल अपनी कमाई का 50% से 70% हिस्सा शिक्षकों और कर्मचारियों की सैलरी पर खर्च करते हैं, इसलिए सालाना फीस बढ़ोतरी को सिर्फ 5% तक सीमित करने से उनके वेतन में उचित वेतन बढ़ोतरी देना मुश्किल हो जाएगा। इससे अनुभवी शिक्षक दूसरे राज्यों में जा सकते हैं और पंजाब में शिक्षा की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ सकता है।
उन्होंने ज़ोर दिया कि पंजाब का शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के स्कूलों के मिले-जुले योगदान से बना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा भरोसे, बातचीत और साझेदारी से आगे बढ़ती है—इस तरह के टकराव से नहीं।