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*अशोक नादिर की नई किताब का भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जॉर्ज मसीह, संविधान विशेषज्ञ एवं देश के वरिष्ठतम वकील बलराम गुप्ता, युद्ध इतिहासकार मेजर जनरल राज मेहता व मोटिवेशनल स्पीकर एवं पूर्व आईएएस अधिकारी विवेक अत्रे ने किया विमोचन *
प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक नादिर की नई किताब “द इंडियन कांस्टीट्यूश–अ कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ लॉ, आर्ट एंड हिस्ट्री” से निकला विमर्श : क़ानून ऐसा बने कि आने वाले समय में मूल संविधान में शामिल कृतियां किसी संशोधन के जरिये भी बाजार में उपलब्ध संविधान की प्रतियों से ना निकाली ना जा सकें
भारत के इतिहास के बीते 5 हज़ार साल की गौरवपूर्ण विरासत के रूप में सम्मिलित कृतियों के साथ खिलवाड़ किया जाना अनुचित है : जस्टिस जॉर्ज मसीह, जज, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया
चण्डीगढ़ : प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक नादिर की नई किताब “द इंडियन कांस्टीट्यूशन –अ कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ लॉ, आर्ट एंड हिस्ट्री” का आज विमोचन समारोह हुआ। इस पुस्तक में देश के संविधान की मूल प्रति में शामिल बाईस कृतियों, जो भारत की निरंतरता और अंतःचेतना का संदेश देती हैं, को बाजार में उपलब्ध प्रतियों से हटाए जाने के महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर किया गया है। इन हटाई गई कृतियों में मोहनजोदड़ो की मुहर हमारी सभ्यतागत गहराई की याद दिलाती है; वैदिक आश्रम नैतिक और शैक्षिक संतुलन को दर्शाता है; और बुद्ध व महावीर के चित्र शासन में करुणा और संयम की शिक्षा देते हैं। रामायण और महाभारत के दृश्य अधिकारों और कर्तव्यों के शाश्वत संतुलन पर बल देते हैं। आगे के पैनलों में अशोक, अकबर, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, टीपू सुल्तान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व नेतृत्व, प्रतिरोध और बलिदान की उस भावना को दर्शाते हैं जिसने भारतीय राष्ट्रत्व को आकार दिया। भारत के पर्वतों, नदियों और समुद्रों के चित्र सहनशीलता, विविधता और एकता के प्रतीक हैं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जॉर्ज मसीह ने इन सभी ऐतिहासिक चित्रों की व्याख्या करते हुए बताया कि इन्हें भारत के इतिहास के बीते 5 हज़ार साल की गौरवपूर्ण विरासत के रूप में सम्मिलित किया गया था और इनके जरिए दर्शाया गया था कि शासक को सहनशीलता, दूरदर्शिता व एकता के साथ ही शासन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन ऐतिहासिक कृतियों के साथ खिलवाड़ करना बेहद अनुचित है।
युद्ध इतिहासकार मेजर जनरल राज मेहता ने अपने सम्बोधन में फ़रमाया कि ये पुस्तक समय की जरूरत थी और अशोक नादिर ने बिलकुल ठीक समय पर इसे दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने इसे संविधान में छेड़छाड़ करार देते हुए कहा कि ये कृतियां डेलीट करने से संविधान की नींव ही हिला दी गई है, जोकि नाकाबिले माफ़ी है। उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू ने ये खुद बनवाई थी और बाबा साहेब आंबेडकर की आत्मा भी इनमें बसी थी, इसलिए ये चित्र हल हाल में संविधान का हिस्सा रहने चाहिए। और ये पुस्तक इस बात के लिए एक अहम दस्तावेज है ये तस्वीरें संविधान की आत्मा हैं और इनके साथ भविष्य में भी कोई भी छेड़छाड़ मंजूर नहीं है
मोटिवेशनल स्पीकर एवं पूर्व आईएएस अधिकारी विवेक अत्रे ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि नादिर ने एक इंजीनियर होते हुए भी एक इतनी गहन रिसर्च करके संविधान के इतने बड़े-बड़े माहिरों से सराहना पाई, ये बहुत ही उल्लेखनीय बात है। इस किताब के आने से आने वाली पीढ़ियों में पुरातन भारत के बारे जागृति पैदा होगी। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान एक सबसे पवित्र पुस्तक है और इसकी पवित्रता पर कोई आंच आये, ये बर्दाश्त नहीं किया सकता।
संविधान विशेषज्ञ एवं देश के वरिष्ठतम वकील बलराम गुप्ता ने कहा कि बिना देरी किए इन चित्रों के समेत प्रतियां तैयार की जानी चाहिए क्योंकि इनके बिना संविधान एक आत्मारहित वस्तु के समान है, और इन कृतियों के जुड़ जाने से संविधान एक जीवंत दस्तावेज में बदल जायेगा।
पुस्तक के लेखक अशोक नादिर ने अपने सम्बोधन में कहा कि हमारे मेड इन इंडिया संविधान में सम्मिलित इन कृतियों के जरिए संविधान निर्माताओं ने प्राचीनता से आधुनिकता के साथ सामजंस्य बिठाया था, परन्तु अफ़सोस है कि 5000 साल की विरासत को समेटे हुई इन कृतियों को हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान सबसे पेयोर और पोयस किताब है, इससे छेड़छाड़ करना पापकर्म के समान है।